मेरी दुनियाँ

छोटी छोटी बातें – उत्कर्ष की

जन्मदिन और परिक्षा का पहला दिन अप्रैल 12, 2010

Filed under: बस यूं ही — उत्कर्ष बेंगाणी @ 1:28 अपराह्न
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आज से वार्षिक परिक्षाएं शरू हो गई। पहला पेपर था विज्ञान यानी साइंस का। कल कुछ राहत रहेगी, गुजराती का पेपर है। इस बार परिक्षाओं की तारीखों ने निराश कर दिया। आज से शरू हो रही है। और आज ही मेरा जन्म दिन भी है। तेरह साल का हो गया हूँ और आठवीं की परिक्षाएं दे रहा हूँ। यानी कोई पार्टी वार्टी नहीं। घर पर पढ़ूं या न पढ़ूं, पिज्जा खाने के लिए बाहर जाने की परमिशन नहीं मिलने वाली। थोड़ा निराश हूँ। इसी लिए कम्प्युटर चालू किया, बुआ आने वाली है,  पढ़ने बैठने के लिए कहे उससे पहले थोड़ी सर्फिंग कर लूं।

 

एक फोटो आलू वैफर के शौकिनों के लिए मार्च 3, 2010

Filed under: बस यूं ही — उत्कर्ष बेंगाणी @ 3:16 अपराह्न
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जब मैने ब्लॉग बनाया था, पाँचवीं में पढ़ता था। अब मैं आठवीं की परीक्षाएं देने वाला हूँ।

बड़ा हो गया हूँ तो फोटो लेने के लिए कैमरा भी मिलने लगा है। यह फोटो खास उन लोगो के लिए मैने ली है जो चिप्स तो खाते है मगर पैकेट का क्या करना है नहीं जानते। कैसी लगी बताना।


यह फोटो मैंने पिछले दिनों सुन्दर बना दी गई कांकरिया झील के वहाँ घुमते हुए ली थी। फोटो पर क्लिक कर बड़ा देख सकते है।

 

तीन मन्दिर, दो पूल और कितने फूल अप्रैल 24, 2009

Filed under: 1 — उत्कर्ष बेंगाणी @ 1:07 अपराह्न
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बहुत बहुत दिनों बाद लिख रहा हूँ. मेरी छूट्टियाँ शुरू हो गई है, मगर शांति फिर भी नहीं. ये क्लास वो क्लास साथ में स्वीमिंग भी.

अच्छा एक गणित की पहेली है, मुझे बहुत पसन्द आयी तो आपसे भी पूछता हूँ. मजेदार है.

तीन मन्दिर है, एक के बाद एक. पहले वाला दुसरे वाले से एक पूल से जूड़ा हुआ है. दुसरा वाला तीसरे वाले से दुसरे पूल से जूड़ा हुआ है.

एक आदमी कुछ फूल लेकर पहले मन्दिर में जाता है और कुछ फूल भगवान को चढा कर दुसरे मन्दिर की ओर जाता है. जब वह पूल से गुजरता है तो उसके हाथ में जो फूल बच गए थे वे दुगुने हो जाते है. वह दुसरे मन्दिर में कुछ फूल चढ-आ कर तीसरे मन्दीर की ओर जाता है. इस बार भी पूल पर से गुजरते हुए उसके हाथ के फूल दुगुने हो जाते है. वह तीसरे मन्दिर में अपने हाथ के सारे फूल चढ़ा देता है.

वह आदमी अगर सभी मन्दीर में एक बराबर फूल चढ़ाता है और पूल से गुजरते हुए दो बार फूल दुगुने होते है तो बताईये वह कितने फूल लेकर चला था, तथा कितने फूल मन्दिर में चढ़ाए?

सोको सोचो….

 

स्कूल बस में छिपकली और मेरी मौज सितम्बर 3, 2008

Filed under: स्कूल में — उत्कर्ष बेंगाणी @ 2:22 अपराह्न
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चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

स्कूल मे छुटी हो गई थी और मे अपना सामान उठाकर क्लास से बहार नीकला और बस की और चल दिया. बस मे पहुचकर बाकी विद्यार्थीयो का इंतजार किया. कुछ ही देर मे वो भी आ गए.

और चालु हुई हमारी बस. बस का माहोल शांत था. इतने मे आ आ छिपकली छिपकली की आवाज आई. मेने झट से उठकर पिछे की ओर देखा तो पिछे बेठे सब लोग खडे होकर आगे आ गए थे. छिपकली से जो डरते थे. मेने सोचा उत्कर्ष तेरी तो मूराद पूरी हो गई. मेने सबसे कहा कि वे आगे आ जाएँ. और फिर मे पीछे जाकर मजे से सो गया. नीद जो आ रही थी.

 

दुख हुआ, उसको मारा क्यों मारा सितम्बर 2, 2008

Filed under: स्कूल में — उत्कर्ष बेंगाणी @ 7:54 पूर्वाह्न
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करीबन 6 महीने हो गए है लिखने को. क्यों? मेरी डायरी जो खो गई थी. अब तो पता भी नही चलता की क्या लीखुँ. पहले तो पता था कि लिखना है क्या नहीं. हा, एक बात याद आई.

पता है मैने भुल से ही सही पर एक लडकी को चाँटा मारा. लेकिन गलती तो उसकी हि थी ना, वरना में क्यो मारूंगा. मेने उसको मारा और घर जाकर उदास हो गया. दुख हुआ मुझे कि मेने उसको मारा.

लेकिन उस मार का असर हुआ. उस दिन के बाद उसने कभी मुझे परेसान नही किया. इसलिए कहा जाता है कि लातो के भूत बातो से नही मानते.

 

खुद क्या चला रहे हो? सितम्बर 15, 2007

Filed under: बस यूं ही — उत्कर्ष बेंगाणी @ 7:14 पूर्वाह्न

शाम थी, पापा और चाचु घर पर आ गए थे। आकर अचानक से पापा ने कहा, देश में बहुत परदुषण फैल गया है। हम सब को साईकल चलानी चाहिए क्योंकि उससे परदुषण नहीं फैलता और आदमी की एकसरसाइज भी हो जाती है। मैने सोचा वाह, पापा खुद कार चलाते है और हमको साईकल चलाने को कहते है।

 

द ड्रेगन डिफेंडर अगस्त 12, 2007

Filed under: बस यूं ही — उत्कर्ष बेंगाणी @ 6:39 पूर्वाह्न

मेरी लिखी हुई कहानी  

 

साल था 1956 मगरमच्चो की टीम ने सत्रह ड्रेगन वोरियर उनके मार्शल आर्ट स्कूल और उनकी सेना पर हमला बोल दिया. सत्रह ड्रेगन वोरियर मे से सिर्फ आठ ही ड्रेगन वोरियर बचे. लियो, बोरी, फ्लोक, मार्गन, लटफूक, केरीयर, कान, और कोफी.

इन मे से मार्गन केपटन था. उसकी एक बेटी थी, उसको भी मार्शल आर्ट आता था. मार्गन एक अच्छा मार्शल आर्टर होने के कारण भी उसे एक चिंता सताती थी की ग्रीन-ड्रेगन और ब्लेक ड्रेगन किसको दिया जाय. और ड्रेगन पहाड़ की चाबी किसको दे क्योंकि ड्रेगन पहाड़ पर जाने वाला अमर हो जाता था. और वह किस गलत इंसान को चाबी नहीं देना चाहता था. फिर उसने ब्लेक ड्रेगन अपनी बेटी को दिया. फिर उसने अखबार पर एड दिया की जिनको भी मार्शल आर्टर बनना है वो गब्लो फ्लावर शोप के पीछे वाले मकान में आ जाए. कुछ दिनो बाद कुछ लोग आये, उनको एक चीज पर पाँव रखना था. एक आया, दुसरा आया, तीसरा आया, चौथा, पाँचव, छठा, सातवाँ और इसी तरह दसवाँ आया वह एक पुलिस था, और लल्लू था. उसे उसके दोस्त बहुत चिड़ाते थे. उसके उस चीज पर पाँव रखते ही जोर जोर से हवा चलने लगी. यह निशानी एक अच्छे मार्शल आर्टर बनने की थी. मार्गन ने उस लल्लू को तुरंत चुन लिया. फिर मार्गन ने उसे जल्द ही उसको मार्शल आर्ट सिखा दिया. इन सब बातो का पता मगरमच्छो की टीम के केप्टन को पता चल गया. उसने न आव देखा न ताव तुरंत ही उन पर हमला बोल दिया. यह युद्ध कई दिनो तक चला. लेकिन मगरमच्छो की टीम के केप्टन ने देखा की वह लल्लू और मार्गन की बेटी एक अकेले ही उसकी सेना के हजार लोगो पर भारी पड़ रहे है. उसने तुरंत ही लपक कर चुपके से मार्गन के पेट में तलवार घोंप दी. मार्गन की बेटी से रहा न गया और मगरमच्छो के कप्तान से लड़ने लगी. और वह लल्लू भी. उन लोगो की लड़ाई दो दिनो तक चली. फिर कैसे पता नहीं की मार्गन की बेटी की व लल्लू की तलवार आपस टक्कराई तो मार्गन की बेटी के सारे कपड़े काले हो गए. और लल्लू के हरे. उनमें इतनी गजब की ताकत आ गई की एक पैर जमीन पर ठोके तो पुरे दुनियाँ में भूकंप आ जाये. और फिर क्या था, मगरमच्छो की टीम की छुट्टी हो गई. फिर उस लल्लू ने केरीयर से पूछा की मैं हरे कपड़े में अचानक कैसे आ गया. केरीयर ने कहा की ड्रेगन अपने मालिक खुद चुनते है. इतने में उस लल्लू की माँ ने उसे हिल्ला कर कहा चल उठ जा सुबह हो गई है. बिचारे लल्लू का सपना और वह हरे कपड़े में आने का राज अधुरा रह गया.