मेरी दुनियाँ

छोटी छोटी बातें – उत्कर्ष की

द ड्रेगन डिफेंडर August 12, 2007

Filed under: बस यूं ही — उत्कर्ष बेंगाणी @ 6:39 am

मेरी लिखी हुई कहानी  

 

साल था 1956 मगरमच्चो की टीम ने सत्रह ड्रेगन वोरियर उनके मार्शल आर्ट स्कूल और उनकी सेना पर हमला बोल दिया. सत्रह ड्रेगन वोरियर मे से सिर्फ आठ ही ड्रेगन वोरियर बचे. लियो, बोरी, फ्लोक, मार्गन, लटफूक, केरीयर, कान, और कोफी.

इन मे से मार्गन केपटन था. उसकी एक बेटी थी, उसको भी मार्शल आर्ट आता था. मार्गन एक अच्छा मार्शल आर्टर होने के कारण भी उसे एक चिंता सताती थी की ग्रीन-ड्रेगन और ब्लेक ड्रेगन किसको दिया जाय. और ड्रेगन पहाड़ की चाबी किसको दे क्योंकि ड्रेगन पहाड़ पर जाने वाला अमर हो जाता था. और वह किस गलत इंसान को चाबी नहीं देना चाहता था. फिर उसने ब्लेक ड्रेगन अपनी बेटी को दिया. फिर उसने अखबार पर एड दिया की जिनको भी मार्शल आर्टर बनना है वो गब्लो फ्लावर शोप के पीछे वाले मकान में आ जाए. कुछ दिनो बाद कुछ लोग आये, उनको एक चीज पर पाँव रखना था. एक आया, दुसरा आया, तीसरा आया, चौथा, पाँचव, छठा, सातवाँ और इसी तरह दसवाँ आया वह एक पुलिस था, और लल्लू था. उसे उसके दोस्त बहुत चिड़ाते थे. उसके उस चीज पर पाँव रखते ही जोर जोर से हवा चलने लगी. यह निशानी एक अच्छे मार्शल आर्टर बनने की थी. मार्गन ने उस लल्लू को तुरंत चुन लिया. फिर मार्गन ने उसे जल्द ही उसको मार्शल आर्ट सिखा दिया. इन सब बातो का पता मगरमच्छो की टीम के केप्टन को पता चल गया. उसने न आव देखा न ताव तुरंत ही उन पर हमला बोल दिया. यह युद्ध कई दिनो तक चला. लेकिन मगरमच्छो की टीम के केप्टन ने देखा की वह लल्लू और मार्गन की बेटी एक अकेले ही उसकी सेना के हजार लोगो पर भारी पड़ रहे है. उसने तुरंत ही लपक कर चुपके से मार्गन के पेट में तलवार घोंप दी. मार्गन की बेटी से रहा न गया और मगरमच्छो के कप्तान से लड़ने लगी. और वह लल्लू भी. उन लोगो की लड़ाई दो दिनो तक चली. फिर कैसे पता नहीं की मार्गन की बेटी की व लल्लू की तलवार आपस टक्कराई तो मार्गन की बेटी के सारे कपड़े काले हो गए. और लल्लू के हरे. उनमें इतनी गजब की ताकत आ गई की एक पैर जमीन पर ठोके तो पुरे दुनियाँ में भूकंप आ जाये. और फिर क्या था, मगरमच्छो की टीम की छुट्टी हो गई. फिर उस लल्लू ने केरीयर से पूछा की मैं हरे कपड़े में अचानक कैसे आ गया. केरीयर ने कहा की ड्रेगन अपने मालिक खुद चुनते है. इतने में उस लल्लू की माँ ने उसे हिल्ला कर कहा चल उठ जा सुबह हो गई है. बिचारे लल्लू का सपना और वह हरे कपड़े में आने का राज अधुरा रह गया.    

 

2 Responses to “द ड्रेगन डिफेंडर”

  1. अरे वाह कहानीकार उत्कर्ष महाराज. जबरदस्त कहानी लिखते हो. अब चाचू से कहो कि इसकी एनिमेशन फिल्म बनायें. म्यूजिक वगैरह के साथ. तब जरा मजा और आये.

    छुट्टी चल रही है?? :)

  2. हे हे, मजेदार! बेचारे लल्लू का शानदार स‌पना अधूरा रह गया। :)


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