मेरी दुनियाँ

छोटी छोटी बातें – उत्कर्ष की

तीन मन्दिर, दो पूल और कितने फूल April 24, 2009

Filed under: 1 — उत्कर्ष बेंगाणी @ 1:07 pm
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बहुत बहुत दिनों बाद लिख रहा हूँ. मेरी छूट्टियाँ शुरू हो गई है, मगर शांति फिर भी नहीं. ये क्लास वो क्लास साथ में स्वीमिंग भी.

अच्छा एक गणित की पहेली है, मुझे बहुत पसन्द आयी तो आपसे भी पूछता हूँ. मजेदार है.

तीन मन्दिर है, एक के बाद एक. पहले वाला दुसरे वाले से एक पूल से जूड़ा हुआ है. दुसरा वाला तीसरे वाले से दुसरे पूल से जूड़ा हुआ है.

एक आदमी कुछ फूल लेकर पहले मन्दिर में जाता है और कुछ फूल भगवान को चढा कर दुसरे मन्दिर की ओर जाता है. जब वह पूल से गुजरता है तो उसके हाथ में जो फूल बच गए थे वे दुगुने हो जाते है. वह दुसरे मन्दिर में कुछ फूल चढ-आ कर तीसरे मन्दीर की ओर जाता है. इस बार भी पूल पर से गुजरते हुए उसके हाथ के फूल दुगुने हो जाते है. वह तीसरे मन्दिर में अपने हाथ के सारे फूल चढ़ा देता है.

वह आदमी अगर सभी मन्दीर में एक बराबर फूल चढ़ाता है और पूल से गुजरते हुए दो बार फूल दुगुने होते है तो बताईये वह कितने फूल लेकर चला था, तथा कितने फूल मन्दिर में चढ़ाए?

सोको सोचो….

 

स्कूल बस में छिपकली और मेरी मौज September 3, 2008

Filed under: स्कूल में — उत्कर्ष बेंगाणी @ 2:22 pm
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चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

स्कूल मे छुटी हो गई थी और मे अपना सामान उठाकर क्लास से बहार नीकला और बस की और चल दिया. बस मे पहुचकर बाकी विद्यार्थीयो का इंतजार किया. कुछ ही देर मे वो भी आ गए.

और चालु हुई हमारी बस. बस का माहोल शांत था. इतने मे आ आ छिपकली छिपकली की आवाज आई. मेने झट से उठकर पिछे की ओर देखा तो पिछे बेठे सब लोग खडे होकर आगे आ गए थे. छिपकली से जो डरते थे. मेने सोचा उत्कर्ष तेरी तो मूराद पूरी हो गई. मेने सबसे कहा कि वे आगे आ जाएँ. और फिर मे पीछे जाकर मजे से सो गया. नीद जो आ रही थी.

 

दुख हुआ, उसको मारा क्यों मारा September 2, 2008

Filed under: स्कूल में — उत्कर्ष बेंगाणी @ 7:54 am
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करीबन 6 महीने हो गए है लिखने को. क्यों? मेरी डायरी जो खो गई थी. अब तो पता भी नही चलता की क्या लीखुँ. पहले तो पता था कि लिखना है क्या नहीं. हा, एक बात याद आई.

पता है मैने भुल से ही सही पर एक लडकी को चाँटा मारा. लेकिन गलती तो उसकी हि थी ना, वरना में क्यो मारूंगा. मेने उसको मारा और घर जाकर उदास हो गया. दुख हुआ मुझे कि मेने उसको मारा.

लेकिन उस मार का असर हुआ. उस दिन के बाद उसने कभी मुझे परेसान नही किया. इसलिए कहा जाता है कि लातो के भूत बातो से नही मानते.

 

खुद क्या चला रहे हो? September 15, 2007

Filed under: बस यूं ही — उत्कर्ष बेंगाणी @ 7:14 am

शाम थी, पापा और चाचु घर पर आ गए थे। आकर अचानक से पापा ने कहा, देश में बहुत परदुषण फैल गया है। हम सब को साईकल चलानी चाहिए क्योंकि उससे परदुषण नहीं फैलता और आदमी की एकसरसाइज भी हो जाती है। मैने सोचा वाह, पापा खुद कार चलाते है और हमको साईकल चलाने को कहते है।

 

द ड्रेगन डिफेंडर August 12, 2007

Filed under: बस यूं ही — उत्कर्ष बेंगाणी @ 6:39 am

मेरी लिखी हुई कहानी  

 

साल था 1956 मगरमच्चो की टीम ने सत्रह ड्रेगन वोरियर उनके मार्शल आर्ट स्कूल और उनकी सेना पर हमला बोल दिया. सत्रह ड्रेगन वोरियर मे से सिर्फ आठ ही ड्रेगन वोरियर बचे. लियो, बोरी, फ्लोक, मार्गन, लटफूक, केरीयर, कान, और कोफी.

इन मे से मार्गन केपटन था. उसकी एक बेटी थी, उसको भी मार्शल आर्ट आता था. मार्गन एक अच्छा मार्शल आर्टर होने के कारण भी उसे एक चिंता सताती थी की ग्रीन-ड्रेगन और ब्लेक ड्रेगन किसको दिया जाय. और ड्रेगन पहाड़ की चाबी किसको दे क्योंकि ड्रेगन पहाड़ पर जाने वाला अमर हो जाता था. और वह किस गलत इंसान को चाबी नहीं देना चाहता था. फिर उसने ब्लेक ड्रेगन अपनी बेटी को दिया. फिर उसने अखबार पर एड दिया की जिनको भी मार्शल आर्टर बनना है वो गब्लो फ्लावर शोप के पीछे वाले मकान में आ जाए. कुछ दिनो बाद कुछ लोग आये, उनको एक चीज पर पाँव रखना था. एक आया, दुसरा आया, तीसरा आया, चौथा, पाँचव, छठा, सातवाँ और इसी तरह दसवाँ आया वह एक पुलिस था, और लल्लू था. उसे उसके दोस्त बहुत चिड़ाते थे. उसके उस चीज पर पाँव रखते ही जोर जोर से हवा चलने लगी. यह निशानी एक अच्छे मार्शल आर्टर बनने की थी. मार्गन ने उस लल्लू को तुरंत चुन लिया. फिर मार्गन ने उसे जल्द ही उसको मार्शल आर्ट सिखा दिया. इन सब बातो का पता मगरमच्छो की टीम के केप्टन को पता चल गया. उसने न आव देखा न ताव तुरंत ही उन पर हमला बोल दिया. यह युद्ध कई दिनो तक चला. लेकिन मगरमच्छो की टीम के केप्टन ने देखा की वह लल्लू और मार्गन की बेटी एक अकेले ही उसकी सेना के हजार लोगो पर भारी पड़ रहे है. उसने तुरंत ही लपक कर चुपके से मार्गन के पेट में तलवार घोंप दी. मार्गन की बेटी से रहा न गया और मगरमच्छो के कप्तान से लड़ने लगी. और वह लल्लू भी. उन लोगो की लड़ाई दो दिनो तक चली. फिर कैसे पता नहीं की मार्गन की बेटी की व लल्लू की तलवार आपस टक्कराई तो मार्गन की बेटी के सारे कपड़े काले हो गए. और लल्लू के हरे. उनमें इतनी गजब की ताकत आ गई की एक पैर जमीन पर ठोके तो पुरे दुनियाँ में भूकंप आ जाये. और फिर क्या था, मगरमच्छो की टीम की छुट्टी हो गई. फिर उस लल्लू ने केरीयर से पूछा की मैं हरे कपड़े में अचानक कैसे आ गया. केरीयर ने कहा की ड्रेगन अपने मालिक खुद चुनते है. इतने में उस लल्लू की माँ ने उसे हिल्ला कर कहा चल उठ जा सुबह हो गई है. बिचारे लल्लू का सपना और वह हरे कपड़े में आने का राज अधुरा रह गया.    

 

इतनी जल्दी पहुंच गए!! May 15, 2007

Filed under: सामान्य — उत्कर्ष बेंगाणी @ 2:17 pm

मेरी छुटीया शरू हो गई है, खुब टीवी देख रहा हूँ.
एक जोक सुनाता हूँ
एक सरदारजी आर वर्ल्ड सिनेमा होल मे फिल्म देखने जा रहा थे. आर वर्ल्ड के नीचे पहुच कर उसने एक रीक्षा वाले को कहा भैया मुझे जल्दी से आर वर्ल्डॅ ले चलो. रीक्षा वाले ने उसे बिठाया और रीक्षा को बायी ओर घुमा दिया और कहा लौ आर वर्ल्ड आ गया सरदार ने घबराते हुए उसे एक हजार रुपए दिए और कहा आगे से इतना तेज मत चलाना.

 

मुझे भुले तो नही। January 21, 2007

Filed under: सामान्य — उत्कर्ष बेंगाणी @ 5:27 am

hello, मुझे भुले तो नही। मेरा नाम उत्कर्ष है। यार ये वाकपेय बड़े अजीब है। बारबार बोलते रहेते है ये अच्छी बात नही। मुजे लगता है एसा बोलना अच्छी बात नही।

पापा ने मुझे कहा सब मुझे याद करते है।  मैं वापस आ गया हू। अब आपका याद करना खतम हुआ। मैं इतने दिनो पढ़ाई में बिजि था। होमवरक कितना देते है मैं थक जाता हू करकर के। उमीद करता हू आप मुझे उत्तर देंगे।

धनीयवाद।

 

अंजेलिना जोली October 2, 2006

Filed under: कविता — उत्कर्ष बेंगाणी @ 4:32 am

आप जानते है अंजेलिना जोली एक अमरीकन हिरोइन है। मेरी फेवरेट है। मैने उन पर एक कविता लिखी है। मै कितने लोगो सूना चुका हु।

ए अंजीलाना जोली,

बनेगी हमजोली,

क्या खेलेगी मेरे साथ होली,

या बान्धेगी मुझे मोली (राखी),

गरबे मे बनेगी मेरी दान्डीया जोड़ी।

 

मे कोन September 27, 2006

Filed under: बस यूं ही — उत्कर्ष बेंगाणी @ 5:43 am

दो वाक्य

सबने पूछा मे कोन हु।

मेरा नाम उत्कर्ष है…भाइ। मै पाचवी मे हुँ। मै लोटस स्कूल मे पढता हुँ। हम लोग स्कूल के सबसे सेतानी बच्चे है।

मै हर तरह के खेल खेल सकता हुँ। मे नो साल का हुँ।

आप लोग मुझे अपने बारे मे बता ये अगर आप मेरे दोस्त बना चहा ते है तो।

मेरे पीता का नाम संजय है और ममी का निधि।

कभी अलवीदा…..न कहना।

सुक्रया॥

 

पांचवी मै आया हुँ September 25, 2006

Filed under: बस यूं ही — उत्कर्ष बेंगाणी @ 12:56 pm

इसी साल मै पांचवी मै आया हुँ। उसके चार-पाँच दिन बाद एक लडकी आइ । मुझे लगा कि वह मेरी दोस्त बन सकती है। पर कुछ दिन बाद  वह मुझे अच्छी नही लगी क्योंकी वह गाली बहुत देती है। वैसे हम लोग स्कूल मै बहुत मजा करते है।लडकीयाँ तो लडकीयाँ जब शीक्षक नही आते तो इधर-उधर भागने लगते है। मै ऐक रेणकर हूँ। मुझे हिन्दी बहुत पस्नदहै। मै उमीद करता हुँ की मेरा अगला साल अच्छा हो।

अलवीदा

उत्कर्ष